Friday, 23 August 2019, 6:31 AM

जीवन मंत्र

निष्ठा और सत्य 

Updated on 21 August, 2019, 6:00
निष्ठा अविभाजित मन, अविभाजित चेतना का स्वभाव है। ईश्वर में तुम्हारी निष्ठा है, उसे जानने का प्रयत्न मत करो। आत्मा में तुम्हारी निष्ठा है, उसे जानने का प्रयत्न मत करो। जिसमें भी तुम्हारी निष्ठा है, उसे जानने की कोशिश न करो। बच्चे को मां में विश्वास है। बच्चा मां को... Read More

ध्वनि तंरगों से रोगें का उपचार  

Updated on 20 August, 2019, 6:00
यह बात जान कर आप सभी को आश्चर्य होगा की ध्वनि तंरगें से भी रोगों के उपाच होते है। यह विश्व जीवों से भरा है। ध्वनि तंरगों की टकराहट से सुक्ष्म जीव मर जाते है, रात्री में सूर्य की पराबैगनी किरणां के अभाव में सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते है जो... Read More

वाणी का शरीर पर प्रभाव  

Updated on 19 August, 2019, 6:00
मानव शरीर में अनेक ग्रंथियां होती हैं,पियूष ग्रंथि मस्तिष्क में होती है, उससे 12 प्रकार के रस निकलते है, जो भावनाओं से विशेष प्रभावित होती हैं। जब व्यक्ति प्रसन्नचित होता है, तो इन ग्रनथियों से विशेष प्रकार के रस बहने लगते है, जिससे शरीर पुष्ट होने लगता है, बुद्धि विकसित... Read More

 मौन का तन मन की सुन्दरता के लिये महत्व 

Updated on 18 August, 2019, 6:00
प्रत्येक मनुष्य सुन्दर एवं स्वस्थ्य रहना चाहता है। सुन्दरता एवं स्वस्थ्य का राज मौन मै छिपा हुआ है। सामान्यतŠ चुप रहना मौन है, प्राचीन पुराण बचन के साथ ईष्या, डाह, छल, कपट और हिन्सा को कम करना मोन होता है। मनोवैज्ञानिक ‘फ्रायड’ का कहना है कि जीवन अन्तर्द्वद्वी शृंखलाओं से... Read More

ध्वनि का प्राणी शरीर पर प्रभाव  

Updated on 17 August, 2019, 6:00
यह जानकर खुश होगें की ध्वनि का प्रभाव प्रत्येक जीव के शरीर पर पड़ता है। वर्तमान औधोगिकी करण और तकनीकि से ध्वनि प्रदूषण अधिक मात्रा में बढ़ रहा है। इस ध्वनि प्रदूषण के परिणाम देखते हुये नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. राबर्ट कॉक ने सन् 1925-26 में एक बात कही थी... Read More

जो नहीं है उसे पाना हो ध्येय

Updated on 14 August, 2019, 6:00
असंतुष्ट होने का अर्थ दुखी होना नहीं है। असल में कोई आदमी पूरी तरह सुखी होकर भी असंतुष्ट हो सकता है। सुखी होने का मतलब है, जो है, उसे आनंद से भोगना। और असंतुष्ट होने का अर्थ है: जो नहीं है उसे आनंद से पैदा करने का श्रम करना। जब... Read More

जीवन के चार आधार

Updated on 13 August, 2019, 6:00
सुसंस्कारिता के चार आधार हैं- समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी। इन्हें आध्यात्मिक-आंतरिक वरिष्ठता की दृष्टि में उतना ही महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए जितना शरीर के लिए अन्न, जल, वस्त्र और निवास अनिवार्य समझा जाता है। समझदारी का अर्थ है- दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाना। आमतौर से लोग तात्कालिक लाभ को सब कुछ... Read More

उपयोगी हल 

Updated on 12 August, 2019, 6:00
एक बार की बात है एक राजा था। उसका एक बड़ा-सा राज्य था।एक दिन उसे देश घूमने का विचार आया और उसने देश भ्रमण की योजना बनाई और घूमने निकल पड़ा। जब वह यात्रा से लौट कर अपने महल आया। उसने अपने मंत्रियों से पैरों में दर्द होने की शिकायत... Read More

सम्यक दृष्टिकोण की जरूरत

Updated on 11 August, 2019, 6:00
आज मानवता को बचाने से अधिक कोई करणीय काम प्रतीत नहीं होता। मनुष्य औद्योगिक और यांत्रिक विकास कर पाए या नहीं, इनसे मानवता की कोई क्षति नहीं होने वाली है, किंतु उसमें मानवीय गुणों का विकास नहीं होता है तो कुछ भी नहीं होता है। एक मानवता बचेगी तो सब... Read More

 व्यक्तिगत चेतना का विस्तार 

Updated on 10 August, 2019, 6:00
दूसरों के सुख-दुख का भागी बनने से हमारी व्यक्तिगत चेतना विकसित होकर विश्व चेतना बन जाती है। समय के साथ जब ज्ञान की वृद्धि होती है, तब उदासीनता संभव नहीं। तुम्हारा आंतरिक स्रोत ही आनन्द है।अपने दु:ख को दूर करने का उपाय है विश्व के दुख में भागीदार होना और... Read More

 'थुकदम’ पर शोध खोलेगा जीवन-मृत्यु का रहस्य 

Updated on 8 August, 2019, 6:00
गीता में कहा गया है कि शरीर तो एक पुतला मात्र है इसमें मौजूद आत्मा जीव है। यह जिस शरीर में होता है उस शरीर के गुण, कर्म और अपेक्षा के अनुरूप मृत्यु के बाद नया शरीर धारण कर लेता है। आत्मा न तो जन्म लेता है और न इसकी... Read More

मन की शक्ति 

Updated on 7 August, 2019, 6:00
मन को जीवन का केंद्रबिंदु कहना असंभव नहीं है। मनुष्य की क्रियाओं, आचरणों का प्रारंभ मन से ही होता है। मन तरह-तरह के संकल्प, कल्पनाएं करता है। जिस ओर उसका रुझान हो जाता है उसी ओर मनुष्य की सारी गतिविधियां चल पड़ती है। जैसी कल्पना हो उसी के अनुरूप प्रयास-पुरुषार्थ... Read More

 इस तरह रामचरित मानस बना धर्म शास्त्र 

Updated on 5 August, 2019, 6:00
करीब पांच सौ साल पहले तक कोई धर्म ग्रंथ हिंदी में नहीं था। सभी धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे और चूंकि मध्य काल में शिक्षा दीक्षा का चलन काफी कम हो गया था, भक्ति भावना या धर्म श्रद्धा के लिए लोग संस्कृत विद्वानों की ओर ही ताकते थे। ऐसा कोई... Read More

दूसरों के दुख से अपना दुख ज्यादा बेहतर

Updated on 4 August, 2019, 6:00
एक कहावत है 'राजा दुखी, प्रजा दुखी सुखिया का दुख दुना।' कहने का अर्थ यह है कि संसार में जिसे देखो वह अपने को दुखी ही कहेगा। राजा का अपना दुख है, प्रजा का अपना और जिसे आप सुखी माने बैठें हैं उससे पूछ कर देंखेंगे तो वह भी अपने... Read More

व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया 

Updated on 3 August, 2019, 6:00
बदलाव का प्रम निरंतर चलता है।जैन दर्शन इस प्रम को पर्याय-परिवर्तन के रूप में स्वीकार करता है। पर्याय का अर्थ है अवस्था।प्रत्येक वस्तु की अवस्था प्रतिक्षण बदलती है।यह जगत की स्वाभाविक प्रक्रिया है। कुछ अवस्थाओं को प्रयत्नपूर्वक भी बदला जाता है।स्वभाव से हो या प्रयोग से, बदलाव की प्रक्रिया को... Read More

दोनों प्रकार का धन एक साथ नहीं मिल सकता  

Updated on 1 August, 2019, 6:00
संसार में दो प्रकार का धन होता है भौतिक धन और दूसरा आध्यात्मिक धन। मनुष्य का स्वभाव है कि वह ज्यादा से ज्यादा धन कमाने की चाहत रखता है। कोई व्यक्ति सोना, चांदी, रूपये पैसे का अंबार लगाकर धनवान कहलाता है तो कोई भूखा, प्यासा रहकर भी धनवान कहलता है।... Read More

 साधना और सुविधा

Updated on 31 July, 2019, 6:00
आसक्ति के पथ पर आगे बढ़ने वाले अपनी आकांक्षाओं को विस्तार देते हैं। उनकी इच्छाओं का इतना विस्तार हो जाता है, जहां से लौटना संभव नहीं है। उस विस्तार में व्यक्ति का अस्तित्व विलीन हो जाता है। फिर वह अपने लिए नहीं जीता। उसके जीवन का आधार पदार्थ बन जाता... Read More

कर्म के पाप-पुण्य में फंस जाता है जीव

Updated on 30 July, 2019, 6:00
ईश्वर क्षेत्रज्ञ या चेतन है, जैसा कि जीव भी है, लेकिन जीव केवल अपने शरीर के प्रति सचेत रहता है, जबकि भगवान समस्त शरीरों के प्रति सचेत रहते हैं। चूंकि वे प्रत्येक जीव के हृदय में वास करने वाले हैं, अतएव वे जीवविशेष की मानसिक गतिशीलता से परिचित रहते हैं।... Read More

सुख की उपेक्षा क्यों?

Updated on 29 July, 2019, 6:00
मेरे पास लोग आते हैं। जब वे अपने दुख की कथा रोने लगते हैं, तो बड़े प्रसन्न मालूम होते हैं। उनकी आंखों में चमक मालूम होती है। जैसे कोई बड़ा गीत गा रहे हों! अपने घाव खोलते हैं, लेकिन लगता है जैसे कमल के फूल ले आए हैं। सुख की... Read More

 सुख के स्वभाव में डूबो 

Updated on 28 July, 2019, 6:00
लगता है, आदमी दुख का खोजी है। दुख को छोड़ता नहीं, दुख को पकड़ता है। दुख को बचाता है। दुख को संवारता है; तिजोरी में संभालकर रखता है।   दुख का बीज हाथ पड़ जाए, हीरे की तरह संभालता है। लाख दुख पाए, पर फेंकने की तैयारी नहीं दिखाता। जो लोग... Read More

 इच्छाओं को समर्पित करते जाओ  

Updated on 27 July, 2019, 6:00
सभी इच्छाएं खुशी के लिए होती हैं। इच्छाओं का लक्ष्य ही यही है। िंकतु इच्छा आपको कितनी बार लक्ष्य तक पहुंचाती है? इच्छा तुम्हें आनंद की ओर ले जाने का आभास देती है, वास्तव में वह ऐसा कर ही नहीं सकती। इसीलिए इसे माया कहते हैं। इच्छा वैâसे पैदा होती... Read More

सम्यक दृष्टिकोण की जरूरत  

Updated on 26 July, 2019, 6:00
आज मानवता को बचाने से अधिक कोई करणीय काम प्रतीत नहीं होता। मनुष्य औद्योगिक और यांत्रिक विकास कर पाए या नहीं, इनसे मानवता की कोई क्षति नहीं होने वाली है, िंकतु उसमें मानवीय गुणों का विकास नहीं होता है तो कुछ भी नहीं होता है। एक मानवता बचेगी तो सब... Read More

इस तरह रामचरित मानस बना धर्म शास्त्र  

Updated on 25 July, 2019, 6:00
करीब पांच सौ साल पहले तक कोई धर्म ग्रंथ हिदीं में नहीं था। सभी धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे और चूंकि मध्य काल में शिक्षा दीक्षा का चलन काफी कम हो गया था, भक्ति भावना या धर्म श्रद्धा के लिए लोग संस्कृत विद्वानों की ओर ही ताकते थे। ऐसा कोई... Read More

दूसरों के दुख से अपना दुख ज्यादा बेहतर  

Updated on 24 July, 2019, 6:00
एक कहावत है 'राजा दुखी, प्रजा दुखी सुखिया का दुख दुना।' कहने का अर्थ यह है कि संसार में जिसे देखो वह अपने को दुखी ही कहेगा। राजा का अपना दुख है, प्रजा का अपना और जिसे आप सुखी माने बैठें हैं उससे पूछ कर देंखेंगे तो वह भी अपने... Read More

संघर्ष का सौंदर्य

Updated on 23 July, 2019, 6:00
एक बार की बात है कि मिट्टी ने मटके से सवाल जवाब करते हुए कहा, ‘मैं भी मिट्टी तू भी मिट्टी, परंतु पानी मुझे बहा ले जाता है और तुम पानी को अपने में समा लेते हो। वह तुम्हें गला भी नहीं पाता, ऐसा क्यों?’ मिट्टी के सवाल पर मटका... Read More

खुद को कर्ता समझ अहंम न पालें 

Updated on 22 July, 2019, 6:00
एक बार हनुमानजी ने प्रभु श्रीराम से कहा कि अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ा, तब मुझे लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण मैंने देखा कि मंदोदरी ने रावण... Read More

शुद्ध मन में आते हैं सद्विचार

Updated on 21 July, 2019, 6:00
मानव जीवन में विचार का विशेष महत्व है। विचार ही इंसान को अच्छा या बुरे कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। ऐसे में मन से खराब और दूषित विचारों को रोकने और निकाल फेंकने के लिए यदि थोड़ी कठिनाई हो तो भी सह लेनी चाहिए। वैसे भी यदि सच्चे... Read More

परिवर्तनशील संसार का शाश्वत सुख 

Updated on 20 July, 2019, 6:00
मनुष्य जीवन अद्भुत है। इस जीवन के रहते जहां कुछ एक-दूसरे से प्यार करते हैं, वहीं कुछ नफरत करते हुए दिखते हैं। यहां तक कि इंसान, इंसान से भाग रहा है। आज का मानव हर दौड़ में आगे निकल जाने का प्रयास करता रहता है। पर यह दौड़ कब तक?... Read More

सहनशीलता में सम्मान 

Updated on 18 July, 2019, 6:00
कहते हैं कि महान से महान व्यक्ति की भी अंतिम समय में भी यदि कोई इच्छा होती है तो वो सिर्फ और सिर्फ और महान बनने की ही होती है। मतलब सम्मान प्राप्त करना किसे अच्छा नहीं लगता है, ऐसे में जरुरी हो जाता है कि सम्मान प्राप्त करने के... Read More

नासमझ रोता है भाग्य का रोना

Updated on 17 July, 2019, 6:00
धर्म कोई भी हो, लेकिन आस्थावान को अपने भाग्य पर उतना ही भरोसा होता है जितना कि जीवन और मरण में। वैसे भी मानव समाज में भाग्य को वो स्थान प्राप्त है जो कि किसी अन्य को हो नहीं सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अथक प्रयासों के बावजूद जो... Read More