Saturday, 06 June 2020, 1:02 AM

जीवन मंत्र

 संयम से जीवन की उन्नति 

Updated on 16 April, 2020, 6:00
कार्तिय माहात्म्य प्रवचनों में पं. रामनिवास ब्रजवासी जी ने कहा शरद ऋतु में की जाने वाली उपासनाओं से जहाँ चंद्र किरणों से प्राप्त होने वाले अमृत तत्व से देह का सिंचन होता है, वहीं सूर्य की रश्मियों की प्रचुर ऊर्जा से उस अमृत तत्व की शरीर में स्थिरता होती है... Read More

वीरत्व की अलंकृति है क्षमा

Updated on 15 April, 2020, 6:00
क्षमा वीरत्व की अलंकृति है। दुर्बल और विवश व्यक्ति द्वारा उद्गीत क्षमा का माहात्म्य उतना प्रखर नहीं हो सकता। ज्ञान की स्फुरणा में मौन की सार्थकता है। शक्ति-संपन्नता में क्षमा की सार्थकता है और त्याग-भावना में आत्मगोपन या अप्रशस्ति की सार्थकता है। शक्ति के अभाव में स्वीकृत का कवच व्यक्ति... Read More

अमिट है कर्म का फल

Updated on 14 April, 2020, 6:00
यदि कर्म का फल तुरंत नहीं मिलता है तो यह नहीं समझना चाहिए कि उसके भले-बुरे परिणाम से हम सदा के लिए बच गये। कर्मफल ऐसा अमिट तथ्य है जो आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा। कभी-कभी परिणाम में देर इसलिए होती है क्योंकि ईश्वर मानवीय बुद्धि की परीक्षा... Read More

 सर्वव्यापी है आत्मा

Updated on 11 April, 2020, 6:00
केवल वह जो क्षणिक है, छोटा या नर है, उसे ही सुरक्षा की आवश्यकता है; जो स्थायी है, बड़ा या विशाल है, उसे सुरक्षा की जरूरत नहीं। सुरक्षा का अर्थ है समय विशेष को लंबा कर देना; इसीलिए सुरक्षा परिवर्तन में बाधक भी होती है। पूर्ण सुरक्षा की स्थिति में... Read More

 निराशा से होती है हार

Updated on 10 April, 2020, 6:00
नियति प्रम के निरंतर उल्लंघन से प्रकृति का अदृश्य वातावरण भी इन दिनों कम दूषित नहीं हो रहा है। भूकम्प, तूफान, बाढ़, विद्रोह, अपराध, महामारियां आदि पर नियंत्रण पाना कैसे संभव होगा, समझ नहीं आता। किंकर्त्तव्यविमूढ़ स्थिति में पहुंचा हतप्रभ व्यक्ति प्रमश: अधिक निराश होता है। इतना साहस और पराक्रम... Read More

सच्चे ज्ञानी की विशेषता

Updated on 8 April, 2020, 6:00
व्यक्ति सत्संगति से तीन वस्तुओं को-शरीर, शरीर का स्वामी या आत्मा तथा आत्मा के मित्र को- एक साथ संयुक्त देखता है, वही सच्चा ज्ञानी है। जब तक आध्यात्मिक विषयों के वास्तविक ज्ञाता को संगति नहीं होती, वे अज्ञानी हैं, वे केवल शरीर को देखते हैं, और जब यह शरीर विनष्ट... Read More

विचारों की तरंगें

Updated on 7 April, 2020, 6:00
राजा की सवारी निकल रही थी। सर्वत्र जय-जयकार हो रही थी। सवारी बाजार के मध्य से गुजर रही थी। राजा की दृष्टि एक व्यापारी पर पड़ी। वह चन्दन का व्यापार करता था। राजा ने व्यापारी को देखा। मन में घृणा और ग्लानि उभर आई। उसने मन ही मन सोचा, 'यह... Read More

सिद्धांत गौण है, सत्ता प्रमुख

Updated on 2 April, 2020, 6:00
पिछले दिनों में राष्ट्रीय रंगमंच पर जिस प्रकार का राजनीतिक चरित्र उभरकर आ रहा है, वह एक गंभीर चिंता का विषय है। ऐसा लगता है, राजनीति का अर्थ देश में सुव्यवस्था बनाए रखना नहीं, अपनी सत्ता और कुर्सी बनाए रखना है। राजनीतिज्ञ का अर्थ उस नीति-निपुण व्यक्तित्व से नहीं है,... Read More

अपनेपन का प्रेम असली प्रेम 

Updated on 31 March, 2020, 6:00
जब प्रेम बहुत गहरा होता है, तब तुम किसी भी गलतफहमी के लिए पूरी जिम्मेवारी लेते हो। पल भर के लिए ऊपरी तौर से नाराजगी व्यक्त कर सकते हो, परन्तु जब इस नाराजगी को दिल से महसूस नहीं करते, तब तुम एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ पाते हो। तब तुम... Read More

कर्म का फल हैं योनियां 

Updated on 30 March, 2020, 6:00
जीवों में शरीर तथा इन्द्रियों की विभिन्न अभिव्यक्तियां प्रकृति के कारण हैं। कुल मिलाकर 84 लाख भिन्न-भिन्न योनियां हैं और ये सब प्रकृतिजन्य हैं। जीव के विभिन्न इन्द्रिय-सुखों से ये योनिया मिलती हैं जो इस या उस शरीर में रहने की इच्छा करता है। जब उसे विभिन्न शरीर प्राप्त होते... Read More

मृत्यु का अर्थ 

Updated on 29 March, 2020, 6:00
मृत्यु एक शात सत्य है। यह अनुभूति प्रत्यक्ष प्रमाणित है, फिर भी इसके संबंध में कोई दर्शन नहीं है।  अब तक जितने ऋषि-महर्षि या संत-महंत हुए हैं, उन्होंने जीवन दर्शन की चर्चा की है। जीवन के बारे में ऐसी अनेक दृष्टियां उपलब्ध हैं जिनसे जीवन को सही रूप में समझा... Read More

 अंतर्दृष्टि से अनुबंधित है ज्ञान

Updated on 24 March, 2020, 6:00
बुद्धि अच्छी चीज है, पर कोरी बौद्धिकता ही सब कुछ नहीं है। इससे व्यक्ति के जीवन में नीरसता और शुष्कता आती है। ज्ञान अंतर्दृष्टि से अनुबंधित है, इसलिए यह अपने साथ सरसता लाता है। ज्ञानी व्यक्तियों के लिए पुस्तकीय अध्ययन की विशेष अपेक्षा नहीं रहती। भगवान महावीर ने कब पढ़ी... Read More

भगवान की विचारणाएं

Updated on 23 March, 2020, 6:00
जब मनुष्य इस जिम्मेदारी को समझ ले कि मैं क्यों पैदा हुआ हूं और पैदा हुआ हूं तो मुझे क्या करना चाहिए? भगवान द्वारा सोचना, विचारना, बोलना, भावनाएं आदि अमानतें मनुष्य को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख-सुविधाएं या विलासिता के साधन जुटा अपना अहंकार पूरा... Read More

प्रार्थना की पुकार

Updated on 22 March, 2020, 6:00
यदि प्रार्थना सच्ची हो तो परमपिता परमेश्वर उस प्रार्थना को जरूर ही सुनते हैं। परमपिता परमेश्वर अत्यंत कृपालु और दयालु हैं, परंतु प्रार्थना के लिए भी हृदय का पवित्र और निर्मल होना अत्यंत आवश्यक है। मन का पवित्र होना, अहंकार और अभिमान से रहित होना नितांत आवश्यक है। ऐसे पवित्र-हृदय-अंतŠ... Read More

 विवेक ही धर्म है 

Updated on 21 March, 2020, 6:00
युग के आदि में मनुष्य भी जंगली था। जब से मनुष्य ने विकास करना शुरू किया, उसकी आवश्यकताएं बढ़ गई। आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से समस्या ने जन्म लिया। समस्या सामने आई तब समाधान की बात सोची गई। समाधान के स्तर दो थे- पदार्थ-जगत, मनो-जगत. प्रथम स्तर पर पदाथरे... Read More

 धर्म क्या है?

Updated on 20 March, 2020, 6:00
धर्म के मुख्यत:  दो आयाम हैं। एक है संस्कृति, जिसका संबंध बाहर से है। दूसरा है अध्यात्म, जिसका संबंध भीतर से है। धर्म का तत्व भीतर है, मत बाहर है। तत्व और मत दोनों का जोड़ धर्म है। तत्व के आधार पर मत का निर्धारण हो, तो धर्म की सही... Read More

नित अभ्यास से दर्शन कर सकते हैं ईश्वर का

Updated on 18 March, 2020, 6:00
सभी शास्त्र  कहते हैं कि बिना भगवान को प्राप्त किये मुक्ति नहीं मिल सकती है। इसलिए भगवान की तलाश के लिए कोई व्यक्ति मंदिर जाता है तो कोई मस्जिद, कोई गुरूद्वारा, तो कोई गिरजाघर। लेकिन इन सभी स्थानों में जड़ स्वरूप भगवान होता है। अर्थात ऐसा भगवान होता है जिसमें... Read More

ईश्वर को पाने के लिए प्रेम मार्ग से गुजरना होगा 

Updated on 17 March, 2020, 6:00
प्रेम शक्ति भी है और आसक्ति भी। जब व्यक्ति का प्रेम कामना रहित होता है तो यह शक्ति होती है और जब प्रेम में किसी चीज को पाने का लोभ रहता है तो यह आसक्ति बन जाती है। सच्चा प्रेम वह होता है जो प्रेम में किसी प्रकार का लोभ... Read More

एक प्रवाह है जीवन 

Updated on 15 March, 2020, 6:00
जीवा एक प्रवाह है। वह रुकता नहीं, बहता रहता है। जो बहता है, वही प्रवाह होता है। जिसमें ठहराव है, गतिहीनता है, वह प्रवाह नहीं हो सकता। प्रवाह स्वच्छता का प्रतीक है, जबकि ठहराव में गंदगी की संभावना बनी रहती है। प्रवाह में जीवनी शक्ति है, जबकि ठहराव में अस्तित्व... Read More

इच्छा का लक्ष्य है खुशी 

Updated on 13 March, 2020, 6:00
बुरी आदत को छोड़ने की असमर्थता तुम्हें तकलीफ देती है। जब तुम बहुत पीड़ित होते हो, वह व्यथा तुम्हें उस आदत से छुटकारा दिलाती है। जब तुम अपनी कमियों से व्यथा महसूस करते हो, तब तुम साधक हो। पीड़ा तुम्हें आसक्ति से दूर करती है। यदि अपने दुर्गुणों को हटा... Read More

रोजाना करें इन वैदिक मंत्रो का जाप, पाए सभी मुसीबतों से छुटकारा

Updated on 11 March, 2020, 6:30
इस व्यस्त दुनिया में सभी को सुख, शान्ति, समृद्धि और वैभव की कामना होती है. लोग इसके लिए बहुत से ध्यान, यग और पाठ भी करते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी मंत्र हैं जिनका रोज सच्चे मन से उच्चारण करने से मन को तो शांति मिलती ही हैं साथ ही... Read More

इसलिए रह जाती है पूर्व जन्म की स्मृतियां 

Updated on 10 March, 2020, 6:00
माना जाता है कि संसार में हम जो भी काम करते अथवा बोलते हैं वह एक उर्जा के रूप में प्रकृति में वर्तमान रहती है। उर्जा के विषय में विज्ञान कहता है कि उर्जा कभी नष्ट नहीं होती है। इसका स्वरूप बदलता रहता है। हमारी आत्मा भी उर्जा का ही... Read More

तुम्हारी सम्पदा है निष्ठा  

Updated on 8 March, 2020, 0:00
यदि तुम सोचने हो कि ईश्वर में तुम्हारी निष्ठा ईश्वर का कुछ हित कर रही है, तो यह भूल है। ईश्वर या गुरु में तुम्हारी निष्ठा ईश्वर या गुरु का कुछ नहीं करती। निष्ठा तुम्हारी सम्पदा है। निष्ठा तुम्हें बल देती है। तुममें स्थिरता, केंद्रीयता, प्रशांति और प्रेम लाती है।... Read More

जीवन और मृत्यु 

Updated on 7 March, 2020, 6:00
चीन में लाओत्से के समय में ऐसी प्रचलित धारण थी कि आदमी के शरीर में नौ छेद होते हैं। उन्हीं नौ छेदों से जीवन प्रवेश करता है और उन्हीं से बाहर निकलता है। दो आंखें, दो नाक के छेद, मुंह, दो कान, जननेंद्रिय, गुदा। इसके साथ चार अंग हैं- दो... Read More

हर जीव में व्याप्त नारायण 

Updated on 6 March, 2020, 6:00
वैदिक साहित्य से हम जानते हैं कि परम-पुरुष नारायण प्रत्येक जीव के बाहर तथा भीतर निवास करने वाले है। वे भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों जगतों में विद्यमान हैं। यद्यपि वे बहुत दूर हैं, फिर भी हमारे निकट हैं-आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतरू हम भौतिक इन्द्रियों से न तो उन्हें... Read More

विवेक ही धर्म है 

Updated on 4 March, 2020, 6:00
युग के आदि में मनुष्य भी जंगली था। जब से मनुष्य ने विकास करना शुरू किया, उसकी आवश्यकताएं बढ़ गई। आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से समस्या ने जन्म लिया।समस्या सामने आई तब समाधान की बात सोची गई। समाधान के स्तर दो थे- पदार्थ-जगत, मनो-जगत. प्रथम स्तर पर पदार्थ के... Read More

 सफलता चाहिए तो पहले ये सीखें

Updated on 3 March, 2020, 6:00
किसी भी काम में लगन का अपना महत्व होता है, सफलता आपकी एकाग्रता पर ही निर्भर करती है। आप संसार को पाने की दौड़ में हो या परमात्मा को, जब तक हम ध्यान लगाकर काम नहीं करेंगे कभी ठीक परिणाम नहीं मिलेगा। इसके लिए जरूरी है कि आप पहले अपने... Read More

न देने वाला मन 

Updated on 2 March, 2020, 6:00
एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल लिए। टोटके या अंधविश्वास के कारण भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। थैली देख कर दूसरों को लगता है कि इसे पहले से किसी ने दे रखा... Read More

व्यवहार से ही मिल गया सवाल का जवाब

Updated on 1 March, 2020, 6:00
एक दार्शनिक समस्याओं के अत्यंत सटीक समाधान बताते थे। एक बार उनके पास एक सेनापति पहुंचा और स्वर्ग-नर्क के विषय में जानकारी चाही। दार्शनिक ने उसका पूर्ण परिचय पूछा तो उसने अपने वीरतापूर्ण कार्यो के बारे में सविस्तार बताया। उसकी बातें सुनकर दार्शनिक ने कहा - शक्ल-सूरत से तो आप... Read More

दु:खी होने की बजाय दुख का उपचार करें 

Updated on 24 February, 2020, 6:00
लोगों से अपने सुना होगा कि संसार में दु:ख ही दु:ख है। असफलता मिलने पर कई बार आप भी यही सोचते होंगे, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। संसार में दु:ख इसलिए है क्योंकि संसार में सुख है। अगर सुख नहीं होता तो दु:ख का अस्तित्व भी नहीं होता है। ईश्वर... Read More